Tuesday, August 12, 2008

अब फैसला हर ज़ुल्म का, करना है आपको!

शिकवा से कुछ होता नहीं, शिकायत न कीजिये
फरियाद होती है नहीं, पंचायत न कीजिए

अब फैसला हर ज़ुल्म का, करना है आपको!
"जैसे की तैसा" कीजिए, इनायत न कीजिए

चोट को न भूलिये, पत्थर उठाइये
पत्थर चलाने वालों पर, पत्थर चलाइये

इस बजारे-ज़ख्म के, सामान सब बने
साहब! "सामाजवाद" को आगे बढाइये

जब जलेंगी आशियाँ सारे ज़मात की,
मतलब सज़ा-ऐ-ज़ुल्म की सबको बताइये

बस उसी कैनवास पर!

देखा! खींचते लकीरों को कैनवास पर,
मजबूरों की, लाचारों की,
बेबसों की, बेचारों की


एक विवशता को,
कलात्मक विशेषता में पिरोता
नहीं चाहता वो, भरना रंग,
अपनी तुलिका से,
जो बिखेरती आभा,
आत्म-स्पंदन के वरण में


क्षण-भंगुरता को ग्राह्य दृश्या,
बस उसी कैनवास पर!

बेबसी का तूफ़ान

लोगों की नज़रों में,
अज़ीब-सी,
बेबसी का तूफ़ान


जो तोड़ता उनके दम को
जो मज़बूर करता मरने को


पर यूँ ही जिजीविषा,
दर-बदर भटक-भटक


धुल के हर कण में
मरते हर क्षण में


तिरस्कार से!
चीत्कार से!
आभार से!
अन्धकार से!
अत्याचार से!

वक़्त पसरा यहाँ अजीबो-गरीब कतार में

दौड़ता शहर रात-दिन रफ्तार में,
वक़्त पसरा यहाँ अजीबो-गरीब कतार में
हर इक आईना रु-ब-रु मुकमल न सही,
पर सूरते दिखती यहाँ हर जीत हर इक हार में
वक़्त पसरा यहाँ अजीबो-गरीब कतार में

गुमा भी दर्द में, सिलवटो में तंज इतनी,
सिकन न साये में, दस्तूर की कफन इतनी,
गुजरा ज़माना फिर लौटा इक नये गुबार में
दौड़ता शहर रात-दिन रफ्तार में,
वक़्त पसरा यहाँ अजीबो-गरीब कतार में