लोगों की नज़रों में,
अज़ीब-सी,
बेबसी का तूफ़ान
जो तोड़ता उनके दम को
जो मज़बूर करता मरने को
पर यूँ ही जिजीविषा,
दर-बदर भटक-भटक
धुल के हर कण में
मरते हर क्षण में
तिरस्कार से!
चीत्कार से!
आभार से!
अन्धकार से!
अत्याचार से!
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