दौड़ता शहर रात-दिन रफ्तार में,
वक़्त पसरा यहाँ अजीबो-गरीब कतार में
हर इक आईना रु-ब-रु मुकमल न सही,
पर सूरते दिखती यहाँ हर जीत हर इक हार में
वक़्त पसरा यहाँ अजीबो-गरीब कतार में
गुमा भी दर्द में, सिलवटो में तंज इतनी,
सिकन न साये में, दस्तूर की कफन इतनी,
गुजरा ज़माना फिर लौटा इक नये गुबार में
दौड़ता शहर रात-दिन रफ्तार में,
वक़्त पसरा यहाँ अजीबो-गरीब कतार में
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